ओम शान्ति !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
"चेले हुए रफूचक्कर,
चेलीं गईं पराये घर,
साथी गए किनारा कर,
जय बम बोले शिवशंकर !"
अब जितना दीखे वह ठीक और न दीखे वह भी ठीक। कान जितना सुनें, ठीक और न सुनें तो भी ठीक। मधुमेह जब तक जिलाए तब तक ठीक, ले जाए तो राम-नाम सत्य है। न लगकर दवा की, न मन से दुआ मांगी। ऐसों की दुआ कबूल होती भी कहां है ?
जो हो रहा है, होने दो। जो चल रहा है, चलने दो। जो जला है, वह बुझेगा ही। जो खिला है, वह मुरझाएगा ही। आग बुझ जाती है। पानी सूख जाता है। हवा रुक जाती है। सूरज, चांद और सितारे उदय होते हैं और अस्त हो जाते हैं। तब इस नश्वर काया की क्या बात ? धरती पर जो आया है, वह जाएगा ही, तो चिंता क्यों ?
परंतु भाई, इस नश्वर देह के जाने पर तुम शोक न करना। अनमोल आंसुओं को न बहाना। मेरी ये पक्तियां याद रखना-
"खुशियों को खरीदा है हमने,
सेहत को सदा नीलाम किया,
लमहा वह याद नहीं आता,
जिस वक्त कि हो आराम किया।
रोगों को सहेजा है हमने,
भोगों को नहीं परहेजा है,
गम बांटे नहीं, खुशियां बोईं,
मुस्कान को सब तक भेजा है।"
तो शिव के निकल जाने पर शव को देखकर रोना क्या ? खुशियां मनाना कि यह रोगग्रस्त जर्जर देह से व्यास नामक जीवधारी का पिंड छूटा। चलो अच्छा हुआ।
मैं ज्ञानी तो नहीं, पर इतना अवश्य जान गया हूं कि यह जो देह मेरी समझी जाती है, वह मेरी नहीं है। मैं देह नहीं हूं। ''ईश्वर-अंश जीवन अविनाशी'' हूं। हिन्दू हूं न। शास्त्रों की वह बात संस्कारों में बैठी हुई है कि जीव तो कर्मों के बंधन में जकड़ा हुआ है। कर्मों का नाश जप-तप और साधनों से नहीं होता। वह तो श्रद्धा, भक्ति और अच्युत भगवान के अनुग्रह से संभव है। ज्ञान की बड़ी महिमा है। भगवान कहते हैं कि मुझे ज्ञानी प्रिय हैं।
लेकिन उनका यह भी कथन है कि ''हम भक्तन के भक्त हमारे''। महात्मा कवि सूरदास के मन में भी यह द्वंद्व था। लेकिन उन्होंने समाधान पा लिया और गाया-
"इक माया, इक ब्रह्म्र कहावत,
'सूरदास' झगरौ।
अबकी बेर मोहि पार उतारौ,
नहिं प्रन जात टरौ॥"

पृष्ठ-2

| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
1    2    3   4   5   6   7
   | वेब निर्माण टीमः हैश नेटवर्क |