ओम शान्ति !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
ज्ञान और भक्ति के संबंध में एक बड़ा रोचक प्रसंग है। एक साधक मोक्ष-मार्ग को जानने के लिए व्याकुल था। उसके गांव में एक साधु आए। उसने रास्ता पूछा। साधु ने बताया कि 'सोऽहम्‌‌-सोऽहम्‌‌' का जाप करो। कुछ दिन बाद दूसरे साधु आए। उन्होंने कहा-'सोऽहम्‌'‌ नहीं, 'दासोऽहम्‌‌' जपा करो। पहले वाले साधु फिर से घूमते-घामते आगए। देखा कि चेला तो 'दासोऽहम्‌-दासोऽहम्‌' जप रहा है। तो उन्होंने समझाया कि 'दासोऽहम्‌' नहीं, 'सदासोऽहम्'‌ जपा करो। इसके उत्तर में अंत में भक्तिवादी कह गए-नहीं बच्चा, 'सदासोऽहम्‌' क्या ? 'दासदासोऽहम‌' जपो। कहने का तात्पर्य यह कि ज्ञान-मार्ग हो या भक्ति-मार्ग, जब तक प्रभु का अनुग्रह प्राप्त नहीं होता, जब तक ''पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्‌।''
ईश्वर क्या है ? बड़ा झमेला है। कोई कहता है कि वह क्षीरसागर में है। कोई कहता है कि वह सातवें आसमान पर है। कोई कहता है कि वह साकेत में है। कोई कहता है कि वह गोलोक में है। कोई कहता है - ''मुझको कहां ढूंढे बंदे, मैं तो तेरे पास में।'' महर्षि अंगिरा कहते हैं कि ईश्वर तुम्हारे बाईं तरफ है, दाहिनी ओर है, पीठ पीछे है और देखो, वह सामने भी है। बहुत सारी लोकोक्तियां हैं जो कहती है- ''मोमें, तोमें, खड्ग-खंभ में व्याप रह्‌यौ जगदीश।'' संत कहते हैं-''पुष्प मध्य ज्यों वास बसत है, मुकुर मध्य ज्यों छांहीं।'' ऐसे ही ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है। कोई सूंघे तो सही। कोई झांके तो सही। कोई कहता है कि इस जग-जंजाल से बचने के बाद ही ईश्वर को पाया जा सकता है।
तो कोई कहता है ''जगत साक्ष्यरूपं नमामः''। कोई कहता है कि हृदयरूपी गुहा में स्थित आत्मा के परमात्मा से मिलन में माया ही सबसे बड़ी बाधा है। यह माया ही मन को चलाती है। मन ही इंद्रियों को आदेश देता है। इंद्रियां ही कर्म करती हैं। इन्हीं कर्मों का फल भोगने के लिए जीव विवश है- '' माया महाठगनि हम जानी।'' लेकिन कुछ ज्ञानियों का कहना है कि माया ही ब्रह्‌म की आदिशक्ति है। उसी के द्वारा जगदीश्वर निखिल ब्रह्‌मांड की उत्पति करते हैं, परिचालन करते हैं और फिर अपनी माया को समेटकर अपने में लीन कर लेते हैं। माया शक्ति है, अनुरक्ति है, भक्ति है, कला और संस्कृति है। वह उमा है, रमा है और शारदा है। है न यह झमेले की बात ?
संत कहते हैं कि ईश्वर को तर्क से नहीं पाया जा सकता। तर्क विवेक नहीं है। लेकिन दुनिया में करोड़ों लोग हैं, उनमें असंख्य चिंतक भी हैं जो मानते हैं कि ईश्वर नाम की कोई वस्तु है ही नहीं। जो कुछ है, वह प्रकृति है।

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