ओम शान्ति !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
कर्म किए जाओ। भाव यह रखो कि ''यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।'' जब कर्म करने का अधिकार हमें मिला है तो क्यों न करें ? जब फल-प्राप्ति पर हमारा वश नहीं है तो उसे लेकर परेशान क्यों हों ? और कर्म ? पाप-पुण्य ? महर्षि व्यास के ये वचन-''परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीड़नम्‌।'' भला सोचो, भला कहो, भला करो। कोई ऐसा काम न करो जिससे दूसरों को कष्ट पहुंचे।
परंतु महाभारत में ही कहा है-
"जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति
जानामि अधर्मं न च मे निवृत्ति।

केनापि देवेन हृदि स्थितेन
यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।"

''मैं धर्म को जानता हूं, परंतु उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं हो पाती। अधर्म और अकर्म को भी जानता हूं, परंतु उनसे निवृत्ति नहीं हो पाती।'' मित्रो, यही हाल मेरा भी है-

"जनम पाय कछु भलौ न कीनौ,
याते अधिक डरौं।
अब मैं कौन उपाय करौं ?"

जिज्ञासाओं का अंत नहीं। पर समाधान का कोई ठिकाना नहीं। इतना अवश्य पता है कि ईश्वर है और अवश्य है। साकार है और निराकार भी है। उसे ग्रहण भी किया जा सकता है-श्रद्धा, भक्ति और प्रेम के द्वारा। उसे समझा भी जा सकता है-सत्‌-चित और आनंद के रूप में।
उसमें से मैंने आनंद को पकड़ लिया है-वही मेरे व्यक्तित्व और कृतित्व का केन्द्र है। इसे समझकर जितना कर सकता हूं, किया है और जिया है।
हां, तो मैं कह रहा था कि उन्यासी वर्ष का होगया। जीवन की अंतिम बेला निकट आ रही है-''सब ठाठ पड़ा रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजारा।'' यह पुत्र-कलत्र, यह संपत्ति और संतति सब यहीं रह जाएंगे। लोग कहते हैं कि साहित्य बचेगा। यह भ्रम है। कालिदास और सूरदास से पहले न जाने कितने कवि हुए हैं, उनका पता नहीं चलता। मेरे देखते-देखते सैकड़ों बहुप्रचारित और बहुप्रसारित साहित्यिक व्यक्तित्व ऐसे लुप्त हुए कि आज उनका कोई नाम भी नहीं जानता। सूर, तुलसी, मीरा और कबीर आज हैं, कल उनकी प्रासंगिकता रहेगी, यह कौन कह सकता है ? वेदों की रचना जिन ऋषियों ने की, उनके नाम किसी को पता हैं ? सारे पुराण, महाभारत, श्रीमद् भागवत गीता, यहां तक कि वेद भी,उनके रचयिताओं का पता न लगने पर, व्यास के साथ जुड़ गए।

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