ओम शान्ति !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
अब व्यास को भी उन सबका कर्त्ता नहीं माना जा रहा है। नैमिषारण्य के अठ्ठासी हजार शौनकादिक ऋषि कौन थे, इसका किसी को क्या पता ? तब मैं और मेरा साहित्य क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा ! लोग कहते हैं कि मैंने हिन्दी व्यंग्य-विनोद में नई ज़मीन तोड़ी है। यह भुलाए नहीं भूलेगी। इस खुशफहमी के लिए मैं क्या कहूं ? लोग यह भी कहते हैं कि मेरी बनाई और चलाई हुई संस्थाओं से मेरा नाम चलेगा। परंतु मैंने बड़ी से बड़ी संस्थाओं को अपने सामने ध्वस्त होते देख लिया है। आगे आने वाले लोगों ने उन संस्थाओं के प्रवर्तकों और परिचालकों के नाम मिटा दिए। कुछ लोगों का कहना है कि मेरी ब्रज और ब्रजभाषा, दिल्ली, हिन्दी और हिन्दी भवन के निर्माण की सेवाओं को लोग नहीं भूलेंगे। किंतु मैं ऐसे भ्रम नहीं पालता। मैं वर्तमान में जिया हूं। जो करने योग्य मेरे वश के काम मेरे सामने आए हैं, उन्हें हंसते-खेलते किया है। अपने समय में यदि मैं कर्तव्य का पालन कर सका तो मेरे लिए यही बहुत है। भविष्य की चिंता न तब थी और न अब है।
हां, तो मैं कह रहा था कि मेरे न रहने पर शोक न करना। मैंने हंसी-खुशी से अपना जीवन गुज़ारा है। तुम भी हंसी-खुशी से मेरी देह को ठिकाने लगा देना। शोक सभाएं मत करना। हो सके तो हास्य-रस के कवि-सम्मेलन कराना। हिन्दी को आगे बढ़ाने की बात निश्चित करना। भाषा के रूप में नहीं, भारतवाणी के रूप में। भारतीय संस्कृति के रूप में। भारत की अमर आत्मा के रूप में। अगर मेरे परवर्ती लोग मानें तो मैं यह कहना चाहता हूं कि-
मेरी इस देह को किसी जंगल में फेंक देना, जिससे जीव-जंतु इस मृत शरीर को खाकर कुछ क्षणों के लिए तो आनंद प्राप्त कर सकें-''माटी खाय जिनावरा, महा-महोच्छव होय।'' अथवा, जल-जीवों के निमित्त इसे किसी नदी में प्रवाहित कर देना। परंतु लोक-लाज और परंपराओं के कारण यदि ऐसा संभव न हो, तो इसे साधारण ढंग से वेद-मंत्रों के साथ अग्नि को समर्पित कर देना। मेरी कर्मकांड मे रुचि नहीं है, न पिंडदान में, न शय्यादान में, न मृतकभोज में। शव से दूषित घर को, शरीर को, वस्त्रों को स्वच्छ करना और देह की नश्वरता का स्मरण करते हूए षट्कर्म करना, प्यारे भाई ! ओम शांति !

('कहो व्यास, कैसी कटी ?', सन्‌ 1994)

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