वंदे हास्यरसम्‌ !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
जीवन में हास्यरस मुझे वरदान की तरह प्राप्त हुआ है। इससे मुझे सहज में ही सिद्धि और प्रसिद्धि, यानी यश और जीवन-साधन प्राप्त हुए हैं। यदि मेरे लेखन में हास्य नहीं आता तो हिन्दी में और साहित्य-समाज में मेरी पैठ नहीं होती। इसी के बल पर मुझे पत्रकारिता में प्रवेश मिला। इसी के कारण मुझे 'पद्मश्री' सहित अनेक राजकीय एवं सामाजिक अलंकरणों और पुरस्कारों की भी प्राप्ति संभव हुई। इसी वजह से देश और विदेश में, जहां हिन्दीप्रेमी बसते हैं, मैं भी पांचवें सवार की तरह पहुंच गया। इन बातों को लगभग सभी लोग जानते हैं। जिन बातों को नहीं जानते उनमें से कुछेक लिख रहा हूं- अगर हास्यरस का संबल मेरे पास नहीं होता तो जीवन में जो अभाव, उपेक्षा और शोषण का शिकार मुझे होना पड़ा, उनसे मैं टूट ही जाता। मेरी मां क्षय रोग से दिवंगत हुई थीं। एक बार डॉक्टरों ने मुझमें भी इसके रोगाणु खोज निकाले। कई महीनों तक खांसी, बलगम, बुखार आदि का शिकार रहा। मैंने कोई खास दवा नहीं की। तब आज की तरह इसका कोई सक्षम उपचार भी विकसित नहीं हुआ था। मैंने इसको दूर करने के लिए हास्यरस के डोज़ लिए और
भला-चंगा होगया। इसी तरह जवानी उतरते-उतरते आंखों ने धोखा दिया और कान भी आनाकानी करने लगे। कहावत है कि 'कान गए अहंकार गया और आंख गईं संसार गया।' जब देखते-देखते संसार अचानक धूमिल हो जाए तो आदमी पर क्या बीतती है ? इसे कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है। अगर हास्यरस मेरे पास न होता तो मैं भी इस अनभ्र वज्रपात से टूटकर बिखर गया होता। लेकिन विधाता के इस क्रूर व्यंग्य पर मैं रोया नहीं, मुस्कराकर खड़ा होगया। आंखों के अभाव को मैंने अभिशाप न मानकर, वरदान के रूप में ही ग्रहण किया। मेरे जीवन में जो उल्लेखनीय सफलताएं आईं, वे सब नेत्र-रोग से ग्रसित हो जाने के बाद ही सुलभ हुईं। पत्रकारिता में आंखों की कमजोरी के बावजूद उपसंपादक से मुख्य उपसंपादक और मुख्य उपसंपादक से सह-संपादक तक

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