वंदे हास्यरसम्‌ !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
पहुंचा। उसके बाद कुछ महीनों के लिए ही सही, एक दैनिक पत्र का प्रधान संपादक भी बन गया। मुझे 'पद्मश्री' भी इसी अवधि में मिली। मेरे स्वर्ण-जयंती और हीरक-जयंती समारोह भी राजधानी तथा देश के कई नगरों में धूमधाम से मनाए गए। विशाल अभिनंदन-ग्रंथ भी मुझे इसी समय में भेंट किया गया। मेरी छहों संतानों की उच्च शिक्षा, शादी-विवाह और नौकरियां आदि भी इसी अवधि में संपन्न हुईं।
यही नहीं, नई दिल्ली के गुलमोहर पार्क में मेरा मकान भी आखिर बन ही गया। इसी आलम में मेरे द्वारा 'राजर्षि टंडन अभिनंदन ग्रंथ', 'गांधी हिन्दी दर्शन' नामक वृहद ग्रंथ और 'ब्रज विभव' महाग्रंथ संपादित हुए। इन उपलब्धियों के अतिरिक्त मैंने इसी बीच दो दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं और हास्यरस का खंडकाव्य 'अनारी नर' भी लिख डाला। अपने व्यंग्य-विनोदी स्तंभों की एक-साथ छह पुस्तकें भी इसी बीच संकलित करके प्रकाशित करा दीं। जैसे महाकवि सूरदास ने महाप्रभु वल्लभाचार्य की प्रेरणा से ब्रज में गोवर्धन पर्वत पर अपनी देखरेख में श्रीनाथजी का मंदिर बनवाकर खड़ा कर दिया था, उसी प्रकार मैंने सूरदासजी की निर्वाणस्थली और अपनी जन्मस्थली परासौली (परम रासस्थली) में एक सारस्वत पीठ और मां शारदा का मंदिर बनवा दिया तथा उनके कर-कमलों में महारासस्थली की कल्पना के अनुसार वीणा के स्थान पर वेणु थमा दी। ये सब हास्यरस की कृपा के फल हैं। मैंने जीवन में से मस्ती को नहीं जाने दिया। उस अहं को भी विकसित करता रहा जो कृतिकार के सृजन को प्रेरित करता है और प्रतिपक्षी की उपेक्षा के प्रति सक्षम होता है। ऐसा वही कर सकता है, जिसके अंदर आनंद का सागर लहराता हो और जिसके मन-मानस में उत्साह के कमल खिलते रहते हों। ये आनंदीवृत्ति और अटूट उत्साह मुझे हास्यरस की अनुकंपा से ही प्राप्त हुए हैं। जब भाई स्व0 प्रफुल्लचंद्र ओझा 'मुक्त' मुझे आनंदमूर्ति कहकर संबोधित करते थे तो छिपाऊंगा नहीं, बहुत अच्छा लगता था। सबसे पहले यह आनंदमूर्ति का अलंकरण मुझे आदरणीया बहन महादेवी वर्मा ने दिया था। मैं चाहता हूं और ईश्वर से प्रार्थना भी करता हूं कि वास्तव में आनंदमूर्ति बनने की क्षमता मुझमें आ जाए। आनंद ही जीवन का परम इष्ट है। वही चिदानंद है, नित्यानंद है और सच्चिदानंद है। मुक्ति-पथ क्या है ? परमानंद की डगर ही तो है ! इस आनंद से ही मनुष्य कर्म-विपाक से छूटता है। इस आनंद से ही जगत की माया उसे नहीं व्यापती। वह इसी आनंद से सच्चिदानंद की शाश्वत शरण में पहुंच जाता है। हास्यरस इस आनंद तक पहुंचने का सबसे सुगम मार्ग है।

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