वंदे हास्यरसम्‌ !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
किसी और की नहीं जानता, कम से कम मैंने तो हास्यरस को इसी रूप में वरण किया है। लिखते-लिखते अपने कुल-धर्म के अनुसार मैंने 'रास रसामृत' नामक एक काव्य-संगीतात्मक पुस्तक भी लिखी है, जो केवल श्रीकृष्ण की लीला तक ही सीमित नहीं है, पाठक को उनके कर्मयोग 'गीता-ज्ञान' तक ले जाती है।
अपनी मधुमेही शारीरिक अक्षमता को ललकारते हुए मैंने अपनी आत्मकथा भी लिख डाली- 'कहो व्यास, कैसी कटी ?'
हास्यरस का दूसरा नाम है- मन की उमंग। जब यह उमंग विकारी होती है तो रति से जुड़ती है, ओज को उत्साहित करती है तथा उसके मार्ग में बाधा उत्पन्न होने पर आक्रोश को जन्म देती है। यानी, व्यंग्य बन जाती है। जब यह उमंग शुद्ध और अविकारी होती है तो उल्लास का रूप धारण कर लेती है, या कहूं कि निर्मल हास्य बन जाती है। जब आत्मानंद की ऊर्जा मुख-मंडल को आभायित करती है तो व्यक्तित्व की रेखाएं ऊपर उठने लगती हैं। जब यह ऊर्जा या उमंग मंद पड़ जाती है तो मुख पर उदासी की रेखाएं नीचे को लटकने लगती है, यानि झुर्रियां पड़ जाती हैं। किसी व्यक्ति के रेखाचित्र अथवा कार्टून से इन उतार-चढ़ावों का रहस्य समझा जा सकता है। वैसे भी जब आदमी प्रसन्न होता है और उसका रोम-रोम अपने को उल्लसित अनुभव करता है तो उसका वक्ष तन जाता है, लटकता हुआ मुंह ऊपर उठ जाता है, अधरों पर मुस्कान खेलने लगती है। हंसने से फेफड़ों में बल आता है और मनुष्य के शरीर में नवीन रक्त का संचार होने से वह पुष्ट और गदगद हो जाता है। लेकिन मनहूसियत में ऐसा नहीं होता। तब आदमी सामने नहीं, नीचे की ओर देखता है। उसका मुंह लटक जाता है और वक्ष सिकुड़ जाता है। कहना यह चाहता हूं कि हास्य उर्ध्वगामी है, जबकि अन्य रसों के बारे में ऐसी बात पूरे विश्वास के साथ नहीं कही जा सकती।
श्रृंगार का संबंध वयः विशेष तक ही सीमित है। निर्विकार, भले और भोले बच्चों पर उसका वैसा असर नहीं होता। तन से क्षीण और मन से विरक्त या तन-मन दोनों से टूटे हुए प्रौढ़ों और वृद्धों में तो इसके प्रति नफरत तक देखी जा सकती है। लेकिन रसराज हास्य वय के सभी सोपानों पर अपना रंग चढ़ाने में प्रभावी है। वह बच्चों की किलक, युवक-युवतियों की मुस्कान है, प्रौढ़ों का ठहाका है और सज्जनेतर व्यक्तियों के हृदय में वह अट्टहास के रूप में प्रकट होता है।
जी, मैंने अनुभव किया है और जीव तथा पदार्थ-विज्ञानी भी यह सिद्ध कर चुके हैं कि पेड़-पौधे भी प्रसन्नता से

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