वंदे हास्यरसम्‌ !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
झूमने लगते हैं। छोटी-छोटी चिड़ियां और जमीन पर रेंगनेवाले जीव भी कभी-कभी चुहल और अठखेली करते देखे गए हैं। गाय, कुत्ता, बिल्ली और खरगोश पर आप प्यार से हाथ फेरिए और उनकी आंखों में झांकिए तो आपको खुशियां नाचती नजर आएंगी। हां, हास्यरस का प्रभाव हिंसक किस्म के जीवों पर उतना नहीं होता। लेकिन जब वे इच्छित शिकार मार लेते हैं और उनका पेट भरा होता है तब वे भी केवल अपनी मादाओं को ही नहीं, अपने आसपास के वातावरण को और जहां तक दृष्टि जाती है, प्रकृति के वैभव को ऐसे मुग्धभाव से देखते हैं जैसे उनके पास भी खुशियों के खजाने की कमी नहीं। हास्यरस का क्षेत्र असीमित है। मुझे तो विधाता की यह चराचर सृष्टि ही हास्य की रंगस्थली लगती है। ये मुस्कराती हुई कलियां, खिलते हुए फूल, लहराती हुई लताएं, झूमती हुई वृक्षों की शाखाएं, उन पर पक्षियों का मधुर कलरव, मोद-विनोद के उत्सव ही तो हैं। खारे समुद्र में मोतियों का जन्म, पाषाण-पर्वतों से कल-कल, छल-छल बहती हुई नदियां और झरने, उनके शिखरों पर हिममंडित रजत मुकुट, मेरे लिए तो प्रकृति की प्रसन्नता के ही द्योतक हैं। सुबह-सुबह प्राची में हौले-हौले उषा-सुंदरी का आगमन, थिरक-थिरककर आकाश से उतरती हुई ये सूर्य की स्वर्ण-रश्मियां, सुखद समीरण के साथ सहमी आती और जाती संध्या, ये झिलमिल करते तारे, ये भुवनमोहिनी चांदनी और चन्द्रहास क्या हैं ? जगती-तल में व्यापक, उदात्त और आनंदमय हास्यरस की विराट अभिव्यक्ति ही है न ! कम-से-कम मुझे तो जगत के कण-कण में व्याप्त इस हास्य में दिव्य सत्ता की आनंदमयी झांकी ही परिलक्षित होती है।
लेकिन इस हास्य को अनुभव करना, इसके प्रसाद से आनंदित होना, जितना आसान है, उसे कलम से उतारना उतना ही कठिन है। ईश्वरीय सत्ता अनुभव की जा सकती है, लेकिन उसकी सही-सही व्याख्या तो नहीं की जा सकती। जैसे ईश्वर के संबंध में 'नेति-नेति' का सहारा लिया गया है, वैसे ही हास्यरस की व्याख्या तो नहीं की जा सकती, लेकिन यह अवश्य बताया जा सकता है कि यह हास्य नहीं है, वह हास्य नहीं है। जैसे काले को कुरूप कहना, अपने विचारों से साम्य न रखने वाले को मंदबुद्धि कहना अथवा किसी के पतन पर प्रसन्न होने को हास्यरस नहीं का जा सकता। आप पैंट पहनते हैं तो मैं आपको पैंटागन कहूं और मैं धोती पहनता हूं तो आप मुझे धोतीप्रसाद कहें, यह तो हास्य नहीं हुआ। आपका पेट पीठ से लगा हुआ है और मेरा पेट शारीरिक विकार के कारण आगे बढ़ गया है, तो इसमें हास्य की क्या बात है ?

पृष्ठ-5

| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
1    2    3    4   5    6    7   8
   | वेब निर्माण टीमः हैश नेटवर्क |