व्यंग्य-विनोद : शास्त्र से लोक तक

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
हृदय का हार, जनाकांक्षा उसकी अभिव्यक्ति का विषय, पुरुषार्थ उसका संबल, जनोपकार ही उसके लिए सबसे बड़ा उपहार। जो अपने लिए 'स्वातः सुखाय' लिखता है, वह शुतुरमुर्ग है, जो अपने कल्याण के लिए अपनी गर्दन को रेत में दबाकर समाज में उठ रही क्रांति की आंधी से बचने की असफल चेष्टा करता है। परंतु कला को जीवनोपयोगी बनाने वाले को हम उस वटवृक्ष की तरह मानते हैं जो बवंडरों में भी अडिग खड़ा रहता है। सबको अपनी सुखद और शीतल छाया प्रदान करता है। हास्य मानस का राजहंस है, जो दूध का दूध और पानी का पानी करने में निपुण है। शिकारी या मांसाहारी नहीं है, चुन-चुनकर मोती लाता है और 'हास्य-सागर' में मंद-मंद विचरण करके जन-जन को नयनानंद और हर्षातिरेक से अभिभूत कर देता है। जैसे हंस को पक्षियों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, वैसे ही सभी रसों में हास्यरस को प्रथम स्थान प्राप्त है। यदि नहीं है तो इस गलती को जल्दी से जल्दी सुधार लेना चाहिए। हम पहले भी बता चुके हैं कि श्रृंगार का महत्व सर्वाधिक युवाओं के लिए है, बच्चों और बूढ़ों के लिए नहीं। परंतु सभी अवस्थाओं में, सभी परिस्थितियों में हास्य सभी को ग्राह्य है। श्रृंगार काम उत्पन्न करता है, वीर विग्रह को जन्म देता है, रौद्र और वीभत्स से सभी डरते हैं तथा शांतरस का सुख तो विरलों को ही प्राप्त होता है। लेकिन हास्य, लोक से लेकर परलोक तक आनंदमय है। लोक में वह लेखक को यश व अर्थ प्रदान करने वाला और व्यवहार कुशल बनाने वाला है- यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे' है। और यदि परलोक है और उसका सृष्टा परब्रह्म है तो हास्य का सच्चिदानंद ही उसे प्राप्त करने का सबसे सुगम मार्ग है।
संस्कृत में 'विनोद' शब्द का धात्वर्थ है- 'भगा देने वाला' अथवा 'निकाल देने वाला'। शायद शब्द रचने वाले ने चिंता या दुःख को भगाने वाला और आनंद देने वाले वचन को 'विनोद' कहा है। इसी प्रकार अंग्रेजी में 'ह्‌यूमर' शब्द का अर्थ है-शरीर के अंतर्गत वह द्रव पदार्थ जिससे स्वभाव का निर्माण होता है। इससे स्पष्ट है कि संस्कृत के 'विनोद' और अंग्रेजी के 'ह्‌यूमर' दोनों का संबंध बुद्धि की अपेक्षा मनोभाव या स्वभाव से अधिक निकट का है।
विनोदी मनुष्य की पहचान यह है कि उसका व्यक्तित्व आनंदी, शांत, हंसमुख तथा सहिष्णुता, विचारशीलता, सात्विकता, उदारता, ममता आदि गुणों से परिपूर्ण होता है। हमारे मत से हास्य मानव जाति का परम उपकारक है। समाज की सेवा ही उसका परम धर्म है। इसलिए 'सेवाहि परमो धर्मः' के स्थान पर मैं दोनों हाथ उठाकर कहना चाहता हूं -'हास्याहि परमो धर्म' (हास्य ही जीवन का परम धर्म है)। परोपकार की पराकाष्ठा और अपने दुःख-दर्द को भूलकर तथा लोक-व्यवहारजनित मन में आई उदासी को त्यागकर जो दूसरों को आनंद से अभिभूत करता है वही सच्चा मानव है और वही सच्चा हास्यकार है।
इस संबंध में कार्लेनी नामक हास्यकार की कथा ध्यान देने योग्य है। एक बार कार्लेनी एक चिकित्सक के पास गया। उसने चिकित्सक से कहा -"श्रीमान, मेरा मन बार-बार उदास हो जाता है।

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