व्यंग्य-विनोद : शास्त्र से लोक तक

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
मुझे कुछ नहीं सुहाता। कोई बात मेरे मन को अच्छी नहीं लगती। कृपा करके कोई ऐसी दवा दीजिए जिससे मेरी उदासी दूर हो। मेरे मन में प्रफुल्लता उत्पन्न हो।" चिकित्सक ने उससे कहा- ''भाई, तुम्हारे इस रोग की केवल एक ही दवा है कि तुम अकेले मत रहा करो। चार खुशमिजाज दोस्तों की मंडली में बैठकर अपना समय बिताया करो। और हां, आजकल कार्लेनी नाम का एक प्रसिद्ध मजाकिया शहर में आया हुआ है। तुम उसकी नकलें और मजाक देखो-सुनो तो तुम्हारी उदासी दूर होगी और मन प्रसन्न होगा।'' कार्लेनी ने चिकित्सक से कहा- ''महोदय, मैं वही कार्लेनी हूं, जिसकी आप तारीफ कर रहे हैं। मैं सारी दुनिया को ठहाके लगवा सकता हूं, लेकिन मुझ जैसा दुःखी और उदास आदमी शायद ही कोई हो।''
मनुष्य इस जगत में जीवन से लेकर मरण तक दुःख-दर्दों से जूझने और अखंड उदासी को सहेजने के लिए बाध्य है। धन्य हैं वे लोग जो अपनी उदासी को दबाकर दूसरों को खिलखिलाने और आनंदविभोर करने को अपना परम कर्तव्य मानते हैं। यह स्वानुभव है। हमने एक स्थान पर लिखा है-
"रोगों को सहेजा है हमने
भोगों को नहीं परहेजा है।
ग़म बांटे नहीं, खुशियां बोईं
मुस्कान को सब तक भेजा है।"

कहने को तो बहुत-सी बातें हैं। स्पेंसर से लेकर पं. रामचंद्र शुक्ल तक ने उनका भांति-भांति से वर्णन किया है। परंतु जैसे "हरि अनंत हरि-कथा अनंता'' वैसे ही हास्य के संबंध में, उसके परम सहचर व्यंग्य के संबंध में दुनिया की भाषाओं को छोड़िए, हिन्दी में कितनी कहानियां, कितने उपन्यास, कितने निबंध और कितनी कविताएं लिखी गई हैं, उनकी संख्या आकाश के तारों की तरह अनगिनत है।
व्यंग्य-विनोद के स्वर हिन्दी कविता में भले ही मंद पड़ गए हों, परंतु साहित्य की अन्य विधाओं में यह खूब फल-फूल रहा है। पद्य के व्यंग्य-विनोद के बादल आज गद्य में बरसकर साहित्य को ''सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्‌" बना रहे हैं और राज-समाज, व्यवस्था, विसंगति, विषमता पर केवल यही विधा निर्भीक होकर प्रहार कर रही है। बाकी तो ''भज गोविंदम, दे पुरस्कारम्‌, ला अलंकारम्‌ ।''

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