व्यंग्य-विनोद : शास्त्र से लोक तक

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
क्षमा कीजिए, मैं व्यंग्य को विनोद से अलग करके नहीं देखता। बिना व्यंग्य के विनोद ऐसा ही है जैसे बिना चीनी के दूध। विनोद में सरसता और सुस्वाद व्यंग्य की खंडसारी से ही आता है। फीका दूध कोई नहीं पीता। जन-रंजन-विहीन व्यंग्य को जनता नहीं पचा पाती। हास्य यदि दूध है तो व्यंग्य दही का जामन, जो दूध को जमा देता है। लेकिन दही यदि खट्टा या कषाय हो तो वह दूध को फाड़ देता है। इसीलिए लोग उल्लसित, उबलित दूध से खट्टे दही को दूर ही रखते हैं।
व्यंग्य-विनोद दोनों सगे भाई हैं। तब रूठकर व्यंग्य अलग घर बसा ले, यह सामाजिकता नहीं है, भारतीयता नहीं है। इसलिए व्यंग्य को अलग विधा के रूप में स्वीकार करना मेरे लिए अग्राह्‌य है। बिना व्यंग्य के समूचा साहित्य ही नहीं, हास्य-कविता भी श्रीहीन है। मेरी मान्यता है कि जिस तरह उत्तम गद्य लिखना पद्य से कहीं कठिन है, उसी प्रकार व्यंग्य लिखना भी..........। व्यंग्य वह सामाजिक और साहित्यिक सिद्धि है, जो हरेक को प्राप्त नहीं होती। इसे अभ्यास से भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लेखक को पहले स्वयं आलंबन बनना पड़ता है। विसंगतियों और विषमताओं के दौर से जो स्वयं नहीं गुजरा, वह राजनीति के मंच पर भाषण तो दे सकता है, व्यंग्य में कशाघात नहीं कर सकता। अगर फिर भी वह ऐसा करने की चेष्टा करता है तो वह केवल आक्रोशी बन जाएगा, गाली-गलौज करने लगेगा, ऐसा बोलेगा और लिखेगा जैसे किसी राजनीतिक दल विशेष का एजेंट हो। उसकी कटूक्तियां स्वयं उसे खा जाएंगी। या, उसके पेशेवर व्यंग्य लिखने के प्रयत्न मात्र शब्दजाल, गपोड़े और बीच-बीच में पाठकों की खीस निकालने वाले सस्ते प्रकरण बन जाएंगे।
अच्छे व्यंग्य-लेखक के लिए सामाजिक नैतिकता पहली शर्त है। जिंदादिल विद्वज्जनों की अंतरंगता प्राप्त किए बिना कोई अच्छा व्यंग्य-लेखक नहीं बन सकता। कहूं कि आम आदमी की मानसिकता के साथ उनका निरंतर जुड़े रहना बहुत जरूरी है। व्यंग्य लिखने के लिए साहित्य की विधाओं का ज्ञान प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं, उसमें

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