व्यंग्य-विनोद : शास्त्र से लोक तक

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
इसी प्रकार बाबू जगन्नाथदास 'रत्नाकर' से लेकर ग्वाल और नवनीत चतुर्वेदी के छंदों में भी व्यंग्य-विनोद की छटा यत्र-तत्र बिखरी हुई है। सेनापति के रूपकों में जो हास्य प्रस्फुटित हुआ है उससे सभी परिचित हैं- '' 'सेनापति' सबदन की रचना बिचारौ यामैं, दाता और सूम दोनों कीन्हें इकसार हैं।'' आदि-आदि।
मराठी के प्रसिद्ध विद्वान और व्यंग्य-विनोद पर व्यापक रूप से विचार करने वाले स्व0 नृसिंह चिंतामणि केलकर ने इन्द्रियविज्ञान की दृष्टि से व्यंग्य-विनोद का क्या महत्व है और जीवन में उसकी क्या उपयोगिता है इस पर शोधपूर्ण निबंध लिखे हैं। श्री रामचंद्र वर्मा ने श्री केलकर की मौलिक कृति 'सुभाषित आणि विनोद' का 'हास्यरस' के नाम से हिन्दी में भाषांतर किया है। मैंने चालीस वर्ष पूर्व इस पुस्तक को पढ़ा था, काव्यशास्त्र के अध्ययन के रूप में। तब सोचा भी नहीं था कि मुझे कभी हास्य के शास्त्रीय स्वरूप से लेकर इसकी लोक-परंपराओं पर भी ऐसी भूमिका बांधनी पड़ेगी।
हां तो हास्यरस क्या है ? इस पर विचार करें। शास्त्रों में लिखा कि हास्य का रंग शुभ्र, यानी गोरा है। इसका देवता प्रमथ है। प्रमथ का अर्थ है देवाधिदेव महादेव, जिन्हें विष नहीं व्यापता। उनके शरीर पर सर्प रेंगते रहते हैं, परंतु वे प्रसन्नानन हैं। अपनी साधना में समाधिरत हैं। परंतु इस सुंदर योगिराज के मस्तक के एक कोने में कलानिधि भी विराजमान हैं। वह मंत्रदाता ही नहीं, तंत्र-कला में भी पारंगत हैं। रुद्रवीणा बजाते हैं। श्रृंगी-नाद करते हैं। डमरू डिमडिमाते हैं। नृत्य-कला के अधिष्ठाता हैं। स्वयं तांडव नृत्य करते हैं और पार्वती को लास्य नृत्य की शिक्षा देते हैं। कामदेव को अनंग बनाने वाले शिव के समान कौन ऐसा प्रेमी होगा जो अपनी मृत पत्नी सती की देह को लेकर पर्वतों को लांघता हुआ देश-देशांतर में उसके विरह में व्याकुल दौड़ता फिरा हो ! शिव योगियों के लिए विरागी, प्रेमियों के लिए अनुरागी, अशिव वेश होने पर भी ' श्रृंगार' के प्रतीक, वीर रस की साक्षात प्रतिमूर्ति 'रौद्र' रूप धारण करके अपना तीसरा नेत्र खोलकर सृष्टि में प्रलय कर देने वाले, ऐसे महानतम कलाकार ही हास्यरस के देवता हो सकते हैं। स्वयं हरि इन्हें देखकर हंसे थे। इनकी बारात को देखकर वह ऐसे बोले कि तुलसीदासजी ने लिखा- ''हरि के बिंग वचन नहिं जाई।'' हमारे पुराणों में जो शिव की कल्पना की गई है, वह हास्य के रूप में ही नहीं, व्यंग्य के रूप में भी उन्हें प्रतिष्ठित करने वाली है।
हास्य के संबंध में यह बात उल्लेखनीय है कि विद्वानों ने इसमें पुरुषत्व का आरोप किया है- ऐसा पुरुष जो अपने को श्रेष्ठ और दूसरों को निम्न, बुद्धिहीन अथवा मूर्ख समझता हो। यों भी साहित्य-सृजन अपने आपमें अहं से प्रेरित होता है। हास्यरस भी इसमें अपवाद नहीं है। उसके दो मुख्य भेद किए गए हैं- आत्मस्थ और परस्थ। आत्मस्थ रूप को हम 'कला कला के लिए' और परस्थ रूप को हम 'कला जीवन के लिए' रूप में स्वीकार करते हैं। जीवन यानी जन-जन। जन-जन का कल्याण, समाज की समुन्नति, उसके दोषों का परिष्कार, जनवाणी उसके

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