समय की देन हूं मैं

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
लेखक वर्ग का लेखन जो पहले राज्याश्रय के लिए होता था, राजाओं और सामंतों की स्तुति ही जिसका धर्म था, जागीर और पुरस्कार पाना जिसका उद्देश्य था। राज्य की प्रतिष्ठा पाकर जन-जन में प्रतिष्ठित कहलवाना ही जिसकी कला का लक्ष्य था। क्या वह आज भी नहीं दुहराया जा रहा ? विश्वबंधुत्व और मानवता के गीत पहले भी गाए जाते थे और आज भी उनका स्तवन हो रहा है। लेकिन मानवता आज के मानव में रही कहां ? वह चंद बुद्धिजीवियों के प्रवचनों एवं लेखों में रह गई है अथवा नेताओं के नारों में। इस विषमता पर, इस अन्याय पर, इस शोषण पर तुमने क्या लिखा और कितना लिखा ? ज़रा बताओ तो सही। मैंने तुम्हें सोने की अंगूठी इसलिए नहीं पहनाई थी कि तुम हाथ उठा-उठाकर उसे चमकाते रहो। उसमें श्याम नगीना इसलिए जड़कर दिया था कि समाज में आज जो कलुष, कटुता और सांवरे अंधकार की कालरात्रि व्याप्त है, उसमें उजाले की किरण का प्रकाश फैला सको। दीन-दुखियों के म्लान मुखमंडल पर मुस्कान की आभा बिखेर सको। मैंने तो तुम्हें व्यंग्य-विनोद के यही उद्देश्य बताए थे। लेकिन लगे रहे तुम अपने को प्रतिष्ठित करने में और भूल गए गरीबी की रेखा के नीचे बैठै हुए उस व्यक्ति को जो दुःखों के मटमैले खारे सागर में डूबा जा रहा है। अब भी समय है। अपने कालमों में, अपने गद्य-पद्य के लेखन में इस अभाव को दूर कर सको तो करो। बहुत कह लिया तुमने स्वान्तः सुखाय के संबंध में। अब 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' को अपना परम साध्य बनाओ। इसी में तुम्हारा और जनजीवन का कल्याण है।







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