समय की देन हूं मैं

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
हां तो मैं गद्य के क्षेत्र में उतरा। उतरा कहना गलत होगा, कहना होगा कि गिरनार पर्वत की सीढ़ियों पर चढ़ना शुरू किया। उछलता हुआ चला। ताजमहल में जैसे लोग अपना नाम खोद जाते हैं, ऐसे ही हर सीढ़ी पर अपनी छाप छोड़ता चला गया। चढ़ता गया, पर मंजिल का ओर-छोर तो दिखाई ही नहीं पड़ता था। पीछे मुड़कर देखना या उतरना तो मैंने सीखा ही नहीं। इसलिए आवाज दे रहा हूं नई पीढ़ी को कि आओ, मुझे सहारा दो। मेरे डगमगाते कदमों को संभालो। हे भविष्य के होनहार लेखकों, मैं नहीं पा सका तो तुम मंजिल को अवश्य प्राप्त करना। उत्साही और लगनशीलों से मिलने के लिए मंजिल खुद उन तक दौड़ी चली आती है।
प्रस्तुत पुस्तक मेरे प्रकाशित और अप्रकाशित व्यंग्य-विनोदी निबंधों का समग्र संकलन है। इस प्रकार के लेख लिखे काफी, छांटे कम। ज़रा सोचिए सन्‌ 36 से सन्‌ 96 तक कितने वर्ष हुए। तभी से निरंतर लिख रहा हूं। अनुमान लगा सकते हो कितना लिखा होगा ? जब-जब उन्हें पढ़ा तो "निज कवित्त केहि लागि न नीका"। लेकिन मुझे कोई भी तो फीका नहीं लगा। परंतु समय की सीमा है। छापने वाले के पास वक्त नहीं है और पाठकों के पास बड़े-बड़े पोथों को पढ़ने की फुरसत नहीं है। वे तो आवरण पृष्ठ देखकर पुस्तक की ओर आकर्षित होते हैं और भूमिका पढ़कर तथा पन्ने पलटकर सोचते कि ''पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।''




(व्यास के हास-परिहास से, सन्‌ 1998)















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