कहां लौं कहिए ब्रज की बात

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
वाली यमुना के संबंध में कहते हैं-'तेरौ दरस मोहे भावै श्रीयमुने' ? क्यों लिखा वल्लभाचार्य ने 'यमुनाष्टक'-'नमामि यमुनामहम्‌ सकल सिद्धि हेतुम्‌ मुदा' ? क्यों एक छोटी-सी पहाड़ी को लोग गिरिराज महाराज कहते हैं ? क्यों 'बोलंत हेला, बचनंत गारी' के लिए प्रसिद्ध ब्रजवासियों को कहा गया-'ब्रज के परम सनेही लोग'? धर्म की दुकानों पर लुटते-पिटते और आज के यथार्थ से सुपरिचित व्यक्तियों की भी यही आकांक्षा है-"एहो विधिना तोपै अंचरा पसारकर मांगत हौं, जनम-जनम दीजो मोहि याही ब्रज बसिबौ।'' क्यों रसखान नंद की गायें बनाना चाहते हैं ? क्यों पंछी बनकर ब्रज के वृक्षों पर बसेरा करने की कामना करते हैं ? यदि पत्थर भी बनना पड़े तो उनकी प्रार्थना है कि गिरि गोवर्धन की शिला उन्हें ही बनाया जाए ? क्या ये मात्र पद्य या गीत हैं ? केवल कविता कहेंगे इन्हें ? नहीं, यह ब्रज का भावलोक है। इसका भूगोल, इतिहास, राजनीति और भौतिकता से कोई संबंध नहीं, रसिकों और भक्तों के हृदय में ब्रज आनंदधाम के रूप में अवस्थित है। इस आनंदधाम में ही उनके सच्चिदानंद आनंदकंद श्री कृष्णचंद्र अहर्निश निवास करते हैं। अनहद नाद की तरह उनकी मनोहर मुरलिया मन-प्राण में गूंजा करती है। नयनों में उन्हीं की छवि छाई रहती है। गाते हैं-'बसो मेरे नैनन में नंदलाल।' या 'मेरे तो गिरिधर गुपाल, दूसरो न कोई।' सूरदास इसी अद्वैत भाव को आंतरिक आस्था से अभिव्यक्त करते हुए इस तरह कहते हैं -"उधो, मन न भए दस-बीस। एक हुतौ सो गयौ स्याम संग, को आराधै ईस ?'' वैष्णव आचार्य लिख गए हैं-'कृष्णएव गतिर्मम' और वल्लभाचार्य गीता के अंतिम श्लोक ''यत्र योगेश्वरः पार्थो धनुर्धराः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।'' के आधार पर अपने अनुयायियों को मंत्र देते हैं -'श्री कृष्ण शरणम्‌ मम।' इस तरह ब्रज की गीता ही श्री कृष्ण के उपदेश के रूप में सर्वमान्य सर्वधर्म-ग्रंथ बन गई है।

ब्रज को जानना है, तो श्रीकृष्ण को जानना ही पड़ेगा। गोपालक के रूप में सही। कृषि के उन्नायक के रूप में सही। ब्रज के लोकनायक के रूप में सही। ललित लीलाधर के रूप में सही। आतताइयों के संहारक के रूप में ही सही। राष्ट्र को समृद्धि के शिखर तक पहुंचाने वाले द्वारावती के संस्थापक के रूप में ही सही। साम्राज्यवाद के विरुद्ध लोकतंत्र और समाजवाद की प्रतिष्ठा करने वाले महापुरुष के रूप में ही सही। परम आसक्ति और चरम निरासक्ति

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