कहां लौं कहिए ब्रज की बात

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
को अपने दोनों हाथों में धारण करने वाले नर-नारायण के रूप में ही सही। महापुरुष और महानेता ही सही। भगवान ही सही। श्रीकृष्ण के बिना ब्रज के मानस में प्रविष्ट होने की कोई अन्य राह ही नहीं है। जिज्ञासुओं को, चाहे वे नास्तिक हों या आस्तिक, ब्रज-तत्व को जानने के लिए श्रीकृष्ण की शरण में जाना ही होगा।

ब्रज का संदेश

क्या है श्री कृष्ण के रूप में ब्रज का संदेश ? कर्म के प्रति आसक्त होते हुए भी निरासिक्त का शाश्वत भाव। रूप, माधुर्य, स्नेह और संयोग में से गुजरते हुए चिरविरह की लालसा। यह विरह ही योग है। यह विरह ही भक्ति है। यह विरह ही जीवन-दर्शन है। यही साहित्य का शाश्वत सत्य है। यही ब्रजवल्लभियों और उनकी स्वामिनी राधारानी का सच्चा स्वरूप है। यही भुक्ति के साथ-साथ मुक्ति का मार्ग भी है।
आज के संदर्भ में यदि इस संदेश को और अधिक नामांकित करना चाहें तो है-'चरैवेति चरैवेति'। चलते चलो, बढ़ते चलो ! क्योंकि यही जीवन की गति है, प्रगति है। बिना थके चलो। आनंद के साथ बढ़ो। परम आनंद की ओर बढ़ो। श्रीकृष्ण का जीवन-वृत्त यही तो कहता है-जन्म लेते ही मथुरा के कारागार से चल पड़े। बाल्यावस्था से निकलते ही वृंदावन की ओर चल पड़े। तरुणाई आते ही मथुरा की ओर गमन किया। मथुरा में नहीं रुके, चल पड़े द्वारावती की ओर। वहां का वैभव भी उन्हें नहीं बांध सका। वह चलते रहे हस्तिनापुर की ओर, इंद्रप्रस्थ की ओर। जहां-जहां व्यथा-पीड़ित पांडवों को जाना पड़ा, उनकी ओर। धर्मराज के अनुज महाबाहु अर्जुन की सहायता के लिए देश-देशांतरों की ओर। यानी महाभारत की ओर। फिर अपने रथ पर बिठाकर अर्जुन को ले चले कौरव-पांडवों की सेना के मध्य की ओर। अपने सखा और भक्त अर्जुन को ले चले विरक्ति से हटाकर योग की ओर। अकर्मण्यता के बोध को नष्ट करके कर्मयोग की ओर। कर्म को ले चले संघर्ष की ओर। यहीं नहीं रुके, ईश्वर की विराट विभुता का दर्शन कराकर ले चले अर्जुन को अपनी, यानी अनंत सत्ता की ओर। पांडवों को चक्रवर्ती राज देकर भी वह उनके पास नहीं रुके। लौट चले द्वारिका की ओर। धन, वैभव, सुरा और सुंदरियों के जाल में फंसे अहंकारी यादवों को अंत में ले चले विनाश-सागर की ओर-चलो आपस में ही लड़ मरो। भौतिक संपत्ति अंत में विनाश का कारण होती है-चलते-चलते कह गए श्रीकृष्ण। ऐसा अदभुत व्यक्तित्व, ऐसा संपूर्ण कलाओं से युक्त, लोकरंजक, लोकरक्षक और सच्चिदानंद संदोह ब्रज के अतिरिक्त किसी और ने अवतरित किया है ? यही ब्रज का महत्व है। यही ब्रज का संदेश है। शेष ब्रज-महिमा तो इस ग्रंथ के पृष्ठ-पृष्ठ पर स्वर्णाक्षरों की तरह अंकित है। कहने को बहुत है। क्या-क्या कहें ? यहां तो केवल इतना ही कहते हैं-'कहां लौं कहिए ब्रज की बात।'

(संपादित ग्रंथ- 'ब्रजव विभव' से, सन्‌ 1987 )

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