हिन्दी चले तो कैसे चले ?

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
लोकभाषाओं का निरादर करके हम अपने को लोकतंत्रीय कहें- इससे बड़ा कोई दूसरा धोखा नहीं। लोकभाषाओं के चलने के मार्ग में आज अंग्रेजी ही सबसे बड़ी बाधा है। अंग्रेजी गई तो लोकभाषाएं आई। लोकभाषाएं आईं तो हिन्दी आईं।
याद रखिए, हिन्दी नहीं चलेगी तो इस देश में समाजवाद भी नहीं चलेगा। समाजवाद कभी परदेश की भाषा में नहीं चला करता। वह जीवन से ही विषमताओं का अंत नहीं करता, भाषागत ऊंच-नीच और असमानता भी उसे सह्य नहीं। स्वभाषा समाजवाद की पहली शर्त है।
याद रखिए, हिन्दी नहीं चलेगी तो सच्ची धर्मनिरपेक्षता भी नहीं चलेगी। यह हिन्दी ही है जो अमीर खुसरो, जायसी, रहीम, रसखान और इंशाअल्ला खां एक ओर, तो दूसरी ओर जार्ज ग्रियर्सन से लेकर फादर कामिल बुल्के को साथ लेकर चली है। अपने-अपने धर्मों पर अडिग रहकर सभी जातियों और भाषाओं के लोगों ने धर्मनिरपेक्ष भाव से हिन्दी की सेवा की है। उसका यह विशेष गुण घटा नहीं, बढ़ा ही है।
याद रखिए, हिन्दी हिन्द का पर्याय है। जब-जब हिन्द आगे बढ़ा है तो हिन्दी आगे बढ़ी है। अगर हिन्द नीचे जाएगा तो हिन्दी भी तरक्की नहीं कर सकती। इसलिए हिन्दी-सेवियों और हिन्दी-प्रेमियों का यह प्रथम कर्त्तव्य है कि वे देश को ऊंचा उठाएं। देशवासियों में स्वदेशानुराग और स्वाभिमान को बढ़ाएं। हिन्दी अपने-आप आगे बढ़ जाएगी, क्योंकि हिन्दी देश की धड़कन है, उसके दिल की आवाज़ है। हिन्दी ही हिन्द है और हिन्द ही हिन्दी है। जब भारतीयों में यह भावना घर कर जाएगी तो जहां-तहां से आने वाले विरोध के स्वर स्वतः ही समाप्त हो जाएंगे। जब यह भावना हिन्दीजनों में भर जाएगी तो देवनागरी अपने-आप चमक उठेगी। उसका साहित्य ऊंचाइयों को छूने लगेगा। ज्ञान-विज्ञान हस्ता मलक हो जाएंगे। तकनीक चरणों की चेरी बन जाएगी। हिन्दी का ही नहीं, भारत का भी मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाएगा। सम्पूर्ण विश्व एक अनोखी ललक के साथ हिन्दी की ओर देखने लगेगा, क्योंकि हिन्दी युद्ध की नहीं, शांति की भाषा है; वैमनस्य का नहीं, प्रेम का संदेशा है; भौतिकता का नहीं, आध्यात्मिकता का पदार्थ-पाठ है, इसी के लिए विश्व आज भटक रहा है।

('बिन हिन्दी सब सून' से, सन्‌ 2002)

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