यह विस्फोट अहम्‌ का है

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
लेकिन क्या मज़ाल कि मेरे या मेरे घर की हालत की भनक किसी को पड़ जाए। बाजार में अंगोछा पहनकर ताश खेलता। कहीं चौपड़ के फड़ जमते तो कहीं शतरंज की बिसात। सती बुर्ज पर रोज छनती। यमुना पार बगीची जाता। सूखे दंड पेलता। जिन-जिन दुकानों पर, मकानों पर, मंदिरों और मठों पर, घाटों के ठाठों पर और पेड़ों के सहारे कवियों की ज़मात जुड़ती तो ऐसी ज़ोर-ज़ोर से कविताएं पढ़ता जो फर्लांगों तक सुनी जा सकती थीं।
मेरे चाहने वालों की शुरू से ही कमी नहीं रही। इत्रवाला मुफ्त में फोया देता। मालिन कलाई में खुशबूदार फूलों का कड़ा पहना देती। हलवाई कहते-गुपालजी, आज चमचम बढ़िया बनी है। चखकर देखो। मैं कहता कि पिताजी बाजार में खाता देखेंगे तो बरस पड़ेगे। दो टुकड़े एक दोने में रख दो। एक मेरा और एक मेरी पत्नी का। मटके में भरा हुआ कुएं का जल। चमचम खाई और जल पिया-हो गई ब्यालू।
यह कहानी उस व्यक्ति की है जो स्टूल पर बैठकर आठ घंटे कंपोज करता। बगल से बहने वाली नाली की संड़ाध नाक से सीधे दिमाग तक पहुंचती। साथियों की परस्पर गाली-गलौज और अश्लील रसियों और लोकगीतों के टुकड़े सुनता। प्रतीक्षा करता रहता कि वेतन किस दिन मिलेगा और कितना मिलेगा। नेहरूजी अक्सर कहा करते थे-
''इस तरह तय की हैं हमने मंजिलें,
गिर पड़े, गिरकर उठे, उठकर चले।''
होंगे नेहरूजी बड़े बाप के बेटे, मैं भी किसी से कम नहीं था। घर में ओढ़ने-पहनने के कपड़े न के बराबर थे। लेकिन कंधे पर खादी के थान लटकाकर उन्हें बेचकर शाम को पैसे जमा कराया करता था। ''घर में भूंजी भांग नहीं, कठौती में चून नहीं, पैसा-धेला पास नहीं, गोझा हिलावै।'' लेकिन कांग्रेस का मेंबर बनाने के लिए चवन्नियां इकट्ठा किया करता था।
मेरी कमाई का महीना वर्ष में एक बार आता था, तब जब रामलीला हुआ करती थी। तब छह आने या आठ आने रोज़ मुझे सीता-लक्ष्मण और राम बनने पर मिला करते थे। पहले तालीम में और बाद में लीला में जमकर खिलाई-पिलाई होती थी। एक महीने पहले से दूध बंध जाया करता था। आज इसके यहां तो कल उसके यहां स्वरूपों की पधरावनी होती थी। चकाचक भोजन और ऊपर से ताम्बूल तथा दक्षिणा भी।

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