यह विस्फोट अहम्‌ का है

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
भरत-मिलाप और राजगद्दी के दिन जो आरती की थाली में पड़ जाए वह स्वामी का और जो स्वरूपों के हाथ में आ जाए वह उनका, इस प्रकार पच्चीस-पचास मिल जाया करते थे। साथ में बड़े-बड़े श्रीमंतों और साधु-संतों द्वारा चरणस्पर्श और जय-जयकार अलग से।
कविता शुरू की थी ब्रजभाषा से। नुमायश के कवि-सम्मेलन में तो एक रुपया मिल गया, बाकी ठन-ठन पाल मदन गोपाल। आगरा में मुंशी प्रेमचंद के सान्निध्य में बच्चन के साथ कविता पढ़ी, मिला सिर्फ किराया। इंदौर से प्रकाशित होने वाली 'वीणा' ने मेरी पहली चार व्यंग्य-विनोद की कविताएं लगातार छापीं, कैसा पारिश्रमिक ! छप गईं यही क्या कम था ? कविता पर पहला पुरस्कार मिला पांच रुपए का दैनिक 'हिन्दुस्तान' से। जब प्रति सप्ताह छपने लगीं तो मेहनताना होगया तीस रुपए माहवार। कविता से मन तो भर सकता है, पेट नहीं भर सकता। पहला लेख छपा प्रयाग के 'देशदूत' साप्ताहिक में। मनीआर्डर आया सात रुपये का। दूसरा छपा साप्ताहिक 'वीर अर्जुन' में। मिले दस रुपये। तीसरा छपा दिल्ली के 'नवयुग' साप्ताहिक में। पांच रुपये की वृद्धि होगई, यानि कुल पंद्रह रुपये मिले। यह था उस समय के साहित्य-लेखन का हाल।
तब कुंजियां लिखीं। ट्यूशन किए। पहली पुस्तक निकली 'उनका पाकिस्तान', लेकिन रायल्टी के नाम पर एक मीठी मुस्कान। हूं न कामगार और श्रमजीवी ! ऐसा कामगार जिसे कभी भरपेट सदाम काम नहीं मिला। ऐसा श्रमजीवी कि जिसने श्रम तो किया, लेकिन उससे जीविका नहीं चली।
ऐसे असाधारण व्यक्ति की कहानी को लिखकर मैं साधारण बनना चाह रहा हूं। इससे बढ़कर और ग़लतफ़हमी क्या हो सकती है ? ग़लतफ़हमी माने भ्रम। मेरी यह पुस्तक भी लोगों को भरमाने वाली है कि वैसा आदमी ऐसा हो सकता है ? अच्छा है, भ्रम बना रहे। कविता की दो पंक्तियां -

"नाम ही भ्रम का है,
यह विस्फोट अहम्‌ का है।"
और अहम्‌ के बिना क्या व्यक्तित्व और क्या कृतित्व ? आत्मकथा तो बिना अहंता के लिखी ही नहीं जा सकती। इसीलिए संत-समीक्षक कह गए हैं कि आत्मकथा लिखना बहुत कठिन है। क्योंकि इसके लेखन में अहंकार से नहीं बचा जा सकता। मैं भी नहीं बचा। क्योंकि जब ढेर सारे अहंकार मेरे पास ज़मा हैं तो जाते-जाते मैं उन्हें आप पर क्यों न लुटा दूं ?


('कहो व्यास, कैसी कटी ?', सन्‌ 1994)


पृष्ठ-3

| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
1    2    3
   | वेब निर्माण टीमः हैश नेटवर्क |